
हवासिंह सांगवान , पूर्व कमाडेंट ,
सीआरपीएफ
मो०न० 94160 56145
मैं अभी जिस अफसर की बात करने जा रहा हूँ उनको मैंने नजदीक से देखा और सुना है । उन अफसर के बारे में मैं कुछ किस्से लिख रहा हूँ आप इनको पढ़कर खुद ही आकलन करें कि ये अफसर कैसे थे ?
ये सन 1981 की बात हैं , मैं अपनी 1 बटालियन (सीआरपीएफ) में अरुणाचल प्रदेश के डिप्रोजा में बतौर इंस्पेक्टर तैनात था ।मेरे कमाडेंट वहां से बदली होकर आईजी दफ्तर शिलोंग में स्टाफ अफसर आ गए थे । कुछ दिनों के बाद उन्होंने मेरी भी बदली शिलोंग में करवा कर मेरे को वहां आईजी दफ्तर के कण्ट्रोल रूम में लगा दिया । कण्ट्रोल रूम में सुबह सात बजे से लेकर शाम के छह बजे तक एक डीएसपी रहता था और शाम को सात बजे से लेकर सुबह छह बजे तक मैं रहता था । मेघालय की राजधानी शिलोंग में टट्टू ग्राउंड बहुत महत्वपूर्ण जगह थी , टट्टू ग्राउंड में अंग्रेजों के समय घोड़ो की दौड़ हुआ करती थी , अभी वहां गधे घोड़े चरते दिखाई देते थे । इसी ग्राउंड के एक तरफ लकड़ी का फुटबॉल का स्टेडियम बना हुआ था । इस टट्टू ग्राउंड के एक छोर पर पहाड़ी पर हमारा आईजी दफ्तर था तो दूसरी तरफ एक बटालियन का मुख्यालय था ।मैं उस बटालियन की SO’s (JCO’s) मेस में रहता था । मैं अपने साथ एक हुक्कटी (छोटा हुक्का) रखता था । ये हुक्कटी और तम्बाकू मैं अपने गाँव से लाया था ।आग के लिए धोबी के कोयले इस्तेमाल करता था । मैंने अर्दली को दिन में चार बार हुक्का भरने का फिक्स समय दे रखा था । मैं शाम को कण्ट्रोल रूम में जाता था और सुबह वापिस मेस में चला आता था । कण्ट्रोल रूम में मेरी मदद के लिए एक एनसीओ और एक सिपाही होते थे ।
उस समय उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए एक ही आईजी होता था जिसका दफ्तर शिलोंग में बिशप कॉटन रोड़ पर होता था । वर्तमान में उत्तर पूर्व राज्यों में लगभग एक दर्जन आईजी होंगें ! उन दिनों आसाम में बहुत बड़ी उथल पुथल चल रही थी और असाम गण परिषद् का हिंसक आन्दोलन चल रहा था । उस समय शिलोंग के आईजी मुश्किल से पंद्रह दिन अपने कार्यालय में बैठ पाते थे । बाकी समय में वे हवाई जहाज और अपनी स्टाफ कार में ही रहते थे ।
हमारे जो ये आईजी साहब थे इनका कद लगभग साढ़े पांच फूट , बहुत बुलंद आवाज़ और एक बहुत स्मार्ट अधिकारी थे । यहाँ एक पुरानी अंग्रेजों के ज़माने की कोठी थी , जिसके दो कमरों के सेट में आईजी अपनी धर्मपत्नी के साथ रहते थे , बीच में कण्ट्रोल रूम था , तथा कण्ट्रोल रूम के साथ में आईजी का कार्यालय था ।आईजी साहब गर्मियों में प्रातः पांच बजे उठते थे और अपनी रसोई में स्वयं चाय बनाते थे और अपनी चाय वहीँ खड़े होकर पीते थे । रसोई में पीछे की तरफ बहुत बड़ा शीशा लगा हुआ था जो हमारे बाथरूम से स्पष्ट नजर आता था । अपनी चाय पीने के बाद एक कप चाय अपनी पत्नी के पास ले जाकर रखते थे । वो सूती यूनिफार्म पहनते थे जिसमें कलफ और प्रेस खुद ही करते थे। अपने निजी पत्र टाइप करने के लिए उनका अपना एक निजी छोटा टाइप राइटर था । जब शाम को अपने निजी निवास में टाइप करते थे तो उनके टाइप राइटर की आवाज़ कण्ट्रोल में साफ़ सुनाई देती थी । रोजाना शाम को पंद्रह बीस मिनट बंगाली भाषा के गाने सुनते थे । उनको सरकारी तौर पर दो अर्दली मिले हुए थे , जिनमें एक का काम था नाश्ता व खाना बनने के बाद डाइनिंग टेबल पर लगाना , दुसरे का काम था आईजी जब कार में कहीं जाते थे तो उनका घर से बना हुआ नाश्ता , खाना पानी आदि कार की डिगी में रखना । खाना बनाने के लिए एक लांगरी था और बर्तन धोने के लिए एक अलग से सिविलियन नौकर लगा रखा था । दोनों सरकारी अर्दली कोठी के साथ में ढलान पर खाली समय में धुप सेंकते रहते थे । शिलोंग एक हिल स्टेशन है जहाँ पर बहुत सर्दी होती है । जबकि लोग बताते थे कि इनसे पहले जो आईजी थे उनकी सेवा में 20-22 जवान थे , कोई बच्चे को लाने ले जाने का काम करता तो कोई कुछ ।
हमारे ये आईजी समय के बहुत पाबंद थे , एक मिनट भी आगे या पीछे नहीं होने देते थे । सुबह ठीक समय पर तैयार होकर सबसे पहले गार्ड पर जाते और सलामी लेते थे । उसके बाद अपने कार्यलय में बैठ जाते थे । कार्यलय में उनके चाय पीने का समय ग्यारह बजे होता था , इस दौरान में सीआरपी से बाहर का कोई उच्च अधिकारी उनसे मिलने आता था तो वह उन्हें चाय पिलाते थे , अन्यथा केवल पानी ही पिलाते थे । वहां शिलोंग में उस समय सीआरपी की तीन बटालियने थी । यदि वहां किसी बटालियन में आईजी विजिट करते थे तो वह चाय और पानी अपने घर से साथ लेकर जाते थे । रोजाना शाम को कार्यालय बंद होने के बाद आईजी खुद अपना किचन बैग उठाते थे और पैदल निचे टट्टू ग्राउंड में मार्किट से अपने घर की सब्जियां और मच्छी खरीदने जाते थे । पैदल आने जाने से उनका व्यायाम पूरा हो जाता था । जब आईजी का सब्जी खरीदने का समय होता था तो मेरा कार्यालय जाने का समय होता था | पहली शाम जब मैं अपने कार्यालय जा रहा था तो आईजी साहब हाथ में थैला लिए पैदल अपनी सब्जी व मच्छी खरीदने जा रहे थे , मुझे रास्ते में मिले , इसलिए मैंने उनको गुड इवनिंग बोल दिया । तो उन्होंने मेरे को टोका , कोई काम है ? मैंने कहा , नहीं सर । आईजी साहब बोले , फिर मुझे किस लिए बोल रहे हो , अपना काम करो । यहाँ मैं समझ गया था कि ये बहुत ही सख्त व उसूल वाले अधिकारी हैं , उसके बाद मैंने उनको कभी रास्ते में अभिवादन नहीं किया ।
एक दिन कण्ट्रोल रूम के डीएसपी ने वहां आईजी कार्यालय के बाहर पोस्ट पर खड़े संतरी को आवाज़ लगाई । इतिफाक से आईजी भी वही सूरजमुखी के पौधों की ओट में खड़े थे , कद ज्यादा ऊँचा न होने की वजह से डीएसपी को दिखाई नहीं दिए । जैसे ही डीएसपी ने संतरी को आवाज़ लगाई तो वह आईजी के कानों में भी पड़ी । आवाज़ कानो में पड़ते ही आईजी जोर से बोले , ठहरिये , डीएसपी साहब आप कैसे अफसर हैं ? आप संतरी को उसकी पोस्ट से हटा रहें हैं , ऐसी ट्रेनिंग आपने कहाँ से ली ? यदि संतरी अपनी पोस्ट (मोर्चा) को छोड़ देगा तो फिर सुरक्षा को कौन संभालेगा ? जैसे कि मैंने बताया उनका कद कम था पर आवाज़ उतनी ही ज्यादा बुलंद , उनके जोर से बोलने की आवाज़ से सब सहम गए और डीएसपी को तो कुछ भी नहीं सूझा । बात ये है कि डीएसपी को पीछा छुड़ाना मुश्किल हो गया । क्योंकि आईजी समय और उसूलों के बहुत पक्के थे और उनके तर्क भी अकाट्य होते थे ।
आईजी के एक ही लड़का था जो कलकत्ता में किसी कॉलेज में पढता था । छुट्टियों के दिनों में वो वहां शिलोंग में आया हुआ था । मैं छुट्टी के दिन कभी कभी कण्ट्रोल रूम में चला जाया करता था । गार्ड के हमारे जवान छुट्टी के दिन बाजार में पिक्चर देखने जाते थे । एक बार छुट्टी के दिन मैं कण्ट्रोल रूम में बैठा हुआ था , आईजी का लड़का जो उन दिनों वहां आया हुआ था , कण्ट्रोल रूम में मेरे पास आया और बोला , क्या हमारे जवान बाजार में पिक्चर देखने जाते हैं , यदि जाते हैं तो उनको बोलना कि मेरी भी एक टिकट ले लेंगे । मैंने गार्ड कमांडर को बुलाकर ऐसे का ऐसा ही बता दिया । और जब जवान पिक्चर देखने गए तो उन्होंने आईजी के लड़के के लिए एक फर्स्ट क्लास का टिकट ले लिया । जब आईजी का लड़का वहां गया तो वहां हमारे एनसीओ ने उसको फर्स्ट क्लास का टिकट दे दिया । तो इस पर उसने पूछा , मेरा फर्स्ट क्लास का टिकट क्यों लिया है ? उन्होंने कहा , हम लोगों ने अपना फर्स्ट क्लास का टिकट लिया है तो इसीलिए आपका भी ले लिया । लड़के ने कहा , मेरा यह टिकट बेच दो और थर्ड क्लास का लेकर आओ , एनसीओ ने ऐसा ही किया । कहने का मतलब है कि उनका एक ही लड़का था उसकी भी आदतें बिलकुल अपने पिता की ही डिट्टो कॉपी थी ।
जैसा मैंने पहले लिखा है कि आईजी महीने में पंद्रह दिन ही शिलोंग में रह पाते थे । जिसके लिए उनको बार बार गुवाहाटी जाकर हवाई जहाज पकड़ना पड़ता था । शिलोंग से गुवाहाटी के लिए सड़क से तीन घंटे का सफ़र था । जैसा कि मैंने पहले बताया , आईजी समय के बड़े पाबंद थे , उनका ब्रेकफास्ट का समय शिलोंग और गुवाहाटी के बीच में हो जाता था , तो वो वहीँ रास्ते में पानी के किसी झरने के पास अपनी गाड़ी रोक कर अपना नाश्ता किया करते थे । एक बार आईजी की कार में स्टेन गन के साथ एक नया नायक भेज दिया , नायक नया था उसको आईजी की आदतों व स्वभाव का नहीं पता था क्योंकि पहले वाले एनसीओ को अचानक कहीं जाना पड़ गया था और न ही आईजी की गाडी के साथ जो एस्कॉर्ट की गाड़ी चलती थी उन्होंने नायक को इन साहब के सवभाव के बारे में कुछ बताया । रास्ते में आईजी के नाश्ते का समय हो गया , नाश्ता करने के बाद आईजी गाड़ी से उतर कर खुद झरने की तरफ टिफ़िन धोने चल पड़े । नायक ने कहा , साहब लाइए मैं साफ़ कर देता हूँ । आईजी उसे बोले , ज्यादा ही बर्तन साफ़ करने की आदत है तो सीआरपी की नौकरी छोड़ कर किसी ढाबे पर चले जाओ । नायक बेचारा सहम गया ।नायक ने जब हमको यह बात बतलाई तो हम बड़े हँसे । हमने उसे कहा कि हमारी गलती है कि हमने आपको आईजी के स्वभाव के बारे में नहीं बताया ।
आईजी कार्यलय में दफ्तरी की एक वैकंसी थी । आईजी ऑफिस पर जो गार्ड थी उसमें एक बिहार का सिपाही था जो अपने भाई को कई दिनों से दफ्तरी की भर्ती करवाने के लिए अपने साथ रखे हुआ था और अपने पैसे से वही मेस में खाना खिला रहा था । वह कई दिन से निचे अफसरों के पास अपने भाई को भर्ती करवाने के लिए प्रार्थना करता रहा और एक दिन मेरे कमाडेंट जो वहां स्टाफ अफसर थे , का इंटरव्यू लिया और उनसे अपना भाई दफ्तरी भर्ती करवाने के लिए प्रार्थना की । इस पर कमाडेंट ने कहा , यह आईजी के अधिकार क्षेत्र की बात है और आईजी को ऐसी सिफारिश करना एक आफत मोल लेना है । सिपाही कुछ ज्यादा ही गिडगिडाने लगा तो कमाडेंट का दिल पसीज गया और उन्होंने आईजी के पास जाकर ये प्रार्थना उनके संज्ञान में लाई और आईजी को कहा , साहब अपना आदमी है उसका भाई है । इस पर आईजी ने पूछा , दफ्तरी की भर्ती की क्या प्रक्रिया है ? कमाडेंट ने बताया कि एम्प्लॉयमेंट दफ्तर के मार्फ़त लेते हैं ।आईजी ने पूछा , जो एम्प्लॉयमेंट दफ्तर के मार्फ़त आयेंगे क्या वह हमारे आदमी नहीं ? क्या वे पाकिस्तानी हैं ? मतलब कमाडेंट को काफी खरी खोटी सुनाई । गार्ड के दुसरे जवानों को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने अपने साथी सिपाही को प्रेरित कर दिया कि मैडम (आईजी की धर्मपत्नी) को जाकर बताओ । दरअसल नीचे के तबके को यह भ्रम होता है कि सभी अफसर अपनी पत्नियों की मानते हैं । और उस जवान ने जब आईजी घर पर नहीं थे तो मैडम को जाकर अपनी प्रार्थना बताई | इस पर मैडम ने कहा , भाई आप आईजी साहब को नहीं जानते , 28 साल से मैं खुद कमोड साफ़ कर रहीं हूँ। आईजी साहब वहीँ करेंगे जो कानून में लिखा है । इसलिए उनको बोलने की कोई जरुरत नहीं है , आप खामखाह मुझे भी डांट पडवाएंगे । जब उस सिपाही ने यह बात अपने साथियों को बताई तो उसके साथियों ने उसको कहा , आईजी एक इन्सान ही है , आईजी सुबह जब गार्ड की सलामी लेने आते हैं तब उस समय पीछे बरामदे में ज्यों ही वो अपने घर से निकलते हैं तो वहां फटाफट जाकर उनके पैर पकड़ लेना ।दुसरे दिन जब आईजी पीछे बरामदे की तरफ से बाहर निकले तो सिपाही ने वैसा ही किया । ज्यों ही सिपाही ने वर्दी (सेरिमोनियल ड्रेस) में होते हुए आईजी के पैरों को हाथ लगाया । इस पर आईजी इतना जोर से चिल्लाए कि पूरा आईजी मुख्यालय स्तम्भ रह गया । आईजी ने वहां खड़े खड़े एडम अफसर को बुलाया और उनसे पूछा , ये जवान किस बटालियन का है ? एडम अफसर ने बताया कि ये जवान यही स्थानीय 58 बटालियन का है । आईजी ने कहा , वैसे तो ये सिपाही सीआरपी में नौकरी करने के काबिल नहीं है क्योंकि ये वर्दी (सेरेमोनियल ड्रेस ) पहन कर भी पैरों के हाथ लगाता है , इसको तुरंत वापिस इसकी बटालियन में भेज दो , और उसको उसी समय बिस्तर बाँध करके उसकी बटालियन में भेज दिया । वैसे मैंने अपने 35 साल की नौकरी में देखा है कि बिहार के लोगों को पैर छूने की आदत सबसे ज्यादा होती है । ये सब वहां की उच्च जातियों की देन है ।
जब कोई डीआईजी या आईजी किसी बटालियन में निरक्षण के लिए जाते हैं तो वे आमतौर पर बटालियन का क्वार्टर गार्ड , जवानों के लंगर , रहने की जगह , मनोरंजन कक्ष इत्यादि देखते हैं । लेकिन हमारे ये आईजी जानते थे कि ये स्थान हमेशा निरक्षण के समय चमका दिए जाते हैं । लेकिन जवानों के शौचालय पर कोई गौर नहीं करता इसलिए वो सबसे पहले जवानों के शौचालय को चेक करते थे । यदि कहीं शौचालय कच्चे होते थे , और ट्रेंच खोद कर बनाए हुए होते थे तो वे सफाई कर्मचारी को बुलाकर उसमें बांस डलवाकर देखते थे कि कितनी गहराई है । क्योंकि कम गहराई होने से जवानों को शौचालय जाने में बड़ी असुविधा होती है । ऐसा कभी कोई हिन्दुस्तानी अफसर नहीं करता । इनका मानना था कि जिस बटालियन के शौचालय साफ़ नहीं तो उस बटालियन में सफाई नहीं । ये जवानों का टर्न आउट (वर्दी) चेक करने से पहले अफसरों का टर्न आउट (वर्दी) चेक करते थे । मुझे याद है एक बार ये हमारी बटालियन में जब निरक्षण करने आए तो सबसे पहले इन्होनें कमाडेंट को टोका और कहा , आपने अपनी हेयर कट्टिंग नहीं करवा कर रखी है तो बटालियन में दूसरों को कैसे टोकोगे ? इनकी आदतों को लगभग पूरी सीआरपी समझ चुकी थी । ये जहाँ भी जाते थे उनके अनुसार ही लोग तैयारी करते थे । वो मच्छी खाने के शौकीन थे लेकिन तले हुए मुर्गे आदि नहीं खाते थे । यदि कहीं उनकी अगुवाई में किसी कमाडेंट ने कुछ ज्यादा खर्च कर दिया होता तो वे समझ जाते थे कि यहाँ कुछ घपला है ।तो वहां का स्पेशल ऑडिट करवा देते थे, और यदि ऑडिट में किसी अफसर की कोई कमी पाई जाती थी तो उस अफसर को इनसे पीछा छुड़वाना मुश्किल हो जाता था । कोई घपला पकडे जाने पर उस अफसर के प्रमोशन पर ये पूर्ण विराम लगा देते थे । फौजों में बड़ी चमचागिरी होती हैं लेकिन इनके ज़माने में चमचों को छिपने की कोई जगह नहीं थी ।
एक बार आईजी का कोई जानकर अधिकारी कलकत्ता से शिलोंग आया था और वह इनके कार्यालय में इनसे मिलने आया । उन्होंने इनसे गाडी मांगी कि उनको शहर में फलानी जगह जाना है । उस समय आईजी की केवल एक ही कार होती थी । उन्होंने अपने ड्राईवर को बुला कर समझा दिया कि इन अफसर को फलानी जगह छोड़ कर आना है । और उनके साथ अपनी गाड़ी भेज दी । वह अधिकारी उनकी गाडी ले गया और जहा उन्होंने बताया था उस जगह को छोड़ कर उससे सात-आठ किलोमीटर आगे गाड़ी ले गया और वहां से गाडी वापिस भेज दी । वापिस आने के बाद जब ड्राईवर आईजी को रिपोर्ट देने गया तो उन्होंने गाड़ी की कार डायरी मंगवाई तो उनको पता चला कि जहाँ उस अधिकारी को छोड़ कर आना था उस स्थान से गाडी आठ किलोमीटर ज्यादा चली है । उन्होंने ड्राईवर से पूछा , गाडी आठ किलोमीटर ज्यादा कैसे चली ? ड्राईवर ने कहा , वो साहब आठ किलोमीटर आगे तक ले गए |श। आईजी ने पूछा , वो कलकत्ता के रहने वाले थे , अगर वो गाड़ी को कलकत्ता ले जाने की कहते तो क्या तुम कलकत्ता ले जाते ? इस पर आईजी ने कहा , ये आठ किलोमीटर का पैसा तुमको अपनी जेब से भरना पड़ेगा। लेकिन वो हवलदार ड्राईवर बहुत सुलझा हुआ था उसने कहा , जो आपका आदेश साहब । आईजी ने ड्राईवर को माफ़ कर दिया और उसे हिदायत देकर छोड़ दिया ।
उन्हीं दिनों आईजी की धर्मपत्नी ने शिलोंग में कोई प्राइवेट स्कुल टीचर की नौकरी ज्वाइन कर ली , उस समय उनकी छह सौ रूपये के लगभग तनख्वाह थी | आईजी ऑफिस किसी मेन रोड़ पर नहीं था । उस समय दो नई जीपें थी और आईजी की पत्नी ने एक जीप के लिए पूछा । आईजी ने कहा , आपको जीप की पेमेंट करनी पड़ेगी । मैडम ने कहा , यदि मैं पेमेंट करुँगी तो मेरी पूरी तनख्वाह ही इसी में चली जाएगी । आईजी ने कहा , फिर नौकरी मत करो । इस पर मैडम ने बीएसएफ के आईजी को विनती की । क्योंकि बीएसएफ की गाड़ी वहां नजदीक से गुजरती थी । वह रोज बीएसएफ की उसी गाडी में आती जाती थी , लेकिन उन्हें सीआरपी की गाडी नहीं दी ।
एक बार आईजी ने आर्मर इंस्पेक्टरो का टेस्ट लेना था । आर्मर एक अलग से ट्रेड है जो हथियारों की मरम्मत का जिम्मेवार होते हैं । ये टेक्निकल ट्रेड है । इसके लिए आईजी ने गुवाहाटी ग्रुप सेंटर से दो अनुभवी आर्मर इंस्पेक्टर बुलवाए और उनको एक महीने तक अपना इंस्ट्रक्टर बना कर क्लास अटेंड की । जब इस विषय को पूरा समझ लिया और सीख लिया उसके बाद ही उन्होंने आर्मर इंस्पेक्टर टेस्ट के लिए उम्मीदवार बुलाए और उनकी परीक्षा ली । कहने का मतलब है कि वह पूर्णतया प्रैक्टिकल थे , कोरी कागजी कार्यवाही में उनका कोई विश्वास नहीं था ।
आईजी जब भी कहीं किसी बटालियन में निरक्षण में जाते थे तो वो देखते थे कि कोई अफसर सरकारी ईमारत का सरकारी किराए पर सरकारी पैसे का दुरूपयोग तो नहीं कर रहा है । एक बार वो शिलोंग में ही एक बटालियन का निरक्षण करने गए तो वहां एक कोठी थी जिसमें हमारे एक डीएसपी का परिवार रहता था और कुछ सरकारी स्टोर था ।आईजी ने पूछा , इसका किराया कौन दे रहा है ? बताया गया कि सरकार दे रही है । उन्होंने पूछा , फिर डीएसपी का परिवार इसमें क्यों रहता है ? तो दुसरे दिन डीएसपी को अपने दफ्तर में बुला लिया और जब से उनका परिवार रह रहा था तब से उसका किराया वसूल करवाया और भविष्य में किराया न देने पर उसको खाली करने का आदेश दे दिया ।
कुछ दिनों के बाद उनको सीआरपी का डीजी बनना था लेकिन इंदिरा गाँधी की सरकार ने उनको डीजी न बना कर उनसे जूनियर श्री बीरबल नाथ को डीजी बना दिया । इस पर आईजी साहब ने सरकार को इतनी सख्त भाषा में बाकायदा सिग्नल दिए कि गृह मंत्रालय की बोलती बंद हो गई और कुछ समय के बाद सरकार को उन्हें डीजी बनाना पड़ा । और वो लगभग ढेढ़ साल , रिटायर होने तक तक सीआरपी के डीजी रहे ।
इन आईजी साहब का नाम था श्री एस.दत्ता.चौधरी । ये गुजरात कैडर के आईपीएस थे और सीआरपीएफ में डेपुटेशन पर आए थे । ये बंगाल के रहने वाले थे और शायद कलकत्ता में साल्ट लेक क्षेत्र में रहते थे ।30 अप्रैल 1983 को सीआरपी के डीजी के पद से रिटायर हो गए थे ।
मेरी रिटायरमेंट से पहले जब 2003 में मैं आरके पुरम में कमाडेंट स्टाफ की ड्यूटी कर रहा था तो एक दिन मेरे एक जानकर डीआईजी जो बंगाली थे , कलकत्ता में रहते थे , मुझ से मिलने आये । मैंने उनसे पूछा , बॉस (श्री दत्ता चौधरी) कैसे हैं ? वो जिन्दा हैं या नहीं ? उन्होंने बताया , अभी कुछ दिन पहले केवल एक ही बार उनसे मिलने गया था , वे बिलकुल वैसे ही थे जैसे बीस साल पहले थे , जब मैं उनसे मिलने गया तो वह घर पर अकेले थे , मुझे ड्राइंग रूम में बैठाया और बोले , चाय पीनी है तो बाहर से मंगवा दूँ और यदि निम्बू की शिकंजी पीनी है तो मैं खुद अपने हाथ से निम्बू की शिकंजी बना कर आपको पिलाता हूँ , और उन्होंने ऐसे ही किया । उनके स्वभाव और आदतों में कोई विशेष फर्क नजर नहीं आया ।
ये ऐसे अफसर थे जिनके अंदर सिस्टम पूरी तरह से समा चूका था , जज्बातों को कभी खुद पर हावी नहीं होने देते थे , हर काम तय समय और कानून के हिसाब से करते थे । मैं आजतक समझ नहीं पाया कि इन्हें कैसा अफसर मानूं ? क्या हर अफसर ऐसा होना चाहिए ? अगर हर अफसर ऐसा हो जाए तो इनका हमारे भारतीय समाज के साथ तालमेल कैसे बने ? हाँ , मैं ये कह सकता हूँ कि मेरा इनके साथ नौकरी करने का भी एक अलग ही अनुभव रहा है । खामखाह का कोई बोझ नहीं था , न खामखाह की कोई औपचारिकताएं थी , बस अपनी ड्यूटी में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए थी । अब ये कैसे अफसर थे आप खुद तय करें और क्या हर अफसर को ऐसा ही होना चाहिए या नहीं आप ही बतलाएं ?
